2

फिर ना कहना हम अकेले रह गए तेरे बिना

फिर ना कहना हम अकेले रह गए तेरे बिना

फिर ना कहना हम अकेले रह गए तेरे बिना
अश्क के दरिया बने और बह गए तेरे बिना

साथ देते आए हो अब तक तो आगे भी चलो
दो कदम मंजिल थी पीछे रह गए तेरे बिना

मैं सदा देता हूँ तुमको फिर ना ऐसा हो कभी
स्वप्न सब खंडहर हुए और ढह गए तेरे बिना

तेरे बिन क्या क्या हुआ , क्या ना हुआ होकर जुदा
वादे थे जन्मों के, वादे  रह गए तेरे बिना

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फिर वही मुस्कान तेरे लब पे हो
और फिर वो ही कशिश दिल में तेरे
है यही एक आरज़ू मेरे सनम
है यही दिलबर दुआ दिल में मेरे


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ये तेरी नाराजगी भी एक अदा है
इस अदा पर मेरा दिल कबसे फ़िदा है
कब तलक सहता रहूँ दर्द-ए-जुदाई
मैं तेरे सजदे में, तू मेरा खुदा है.

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2

उपहार

 इस रचना के साथ ही "तुम्हारे लिए"  पुस्तक सम्पूर्ण हुई.  


उपहार


मैं कैसे मनाऊँजनम दिन तुम्हारा?
जनम दिन तुम्हारा ये शुभ दिन तुम्हारा, मैं कैसे..............

ये शुभ कामनाएं तुम्हें किस तरह दूँ?
हज़ारों दुआएं तुम्हें किस तरह दूँ? 
कैसे दूँ तुमको ये  उपहार प्यारा?   मैं कैसे.............

यही कामना है सदा खुश रहो तुम
जीवन के सुख दुःख को हँस कर सहो तुम
संसार सागर में पाओ किनारा. मैं कैसे.............. 

ये शब्दों के मोती तुम्हारे लिए हैं
स्वप्न-भेंट छोटी तुम्हारे लिए है
तुम्हारे लिए है ये जीवन हमारा.  मैं कैसे..............

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0

मुक्त

मुक्त

मुक्त मुक्त मुक्त , 
उन्मुक्त सुप्त गुप्त, 
अहो! मुक्त हो  गया मानव
जीवन के बंधन से
मुक्त हो गया मानव
सुख दुःख के क्रंदन से 
मुक्त हो गया मानव
सृष्टि कण में विचरण को 
मुक्त हो गया मानव 
इश्वर दर्शन को 
यह सुप्त अवस्था
अक्षय शांति देने वाली
वह स्वप्न जो मानव देख रहा था 
लुप्त हो गया 
यह गुप्त बात है
नहीं किसी ने
अब तक जानी 
क्या देख रहा है "स्वप्न"
तुम्हें बतलाये कैसे
जो मानव सो गया.


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याचना

याचना

तुम्हारी आवाज़ को मैंने
अपने अंतर्मन में सुना
तुम्हारी तस्वीर को अंतर्दृष्टि से देखा
फिर भी मैं तुम्हें न पहचान सका
जीवन के प्रारंभ से पहले
मैं तुमसे मिला था
जब मैं तुमसे बिछुड़ कर मनु बन गया था
पहचानता भी कैसे
आज युगों बाद
मैं अपनी दृष्टि भी तो खो चुका था
लेकिन तुम्हारी आवाज़
कुछ जानी पहचानी सी लगी
क्यूंकि मुझे याद है
तुम्हारी ही आवाज़
मेरे अंतर्मन तक पहुँच सकती थी
लेकिन तुमने मेरी दृष्टि क्यूँ छीन ली
मुझे मेरी वही दृष्टि दान दो
मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ
तुम्हें पहचानना चाहता हूँ
  कि  तुम वही हो या नहीं
जिसे मैं खोज रहा हूँ युगों से 
पा रहा हूँ युगों से,
 खो रहा हूँ युगों से .


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2

प्रतीक्षा:भावी की

प्रतीक्षा:भावी की

भावी, अवश्यम्भावी
अद्रश्य अमूर्त का दर्शन
सिर्फ स्वप्न में ही नहीं
आत्मीय जनों का युगों  बाद मिलन
आश्रम का परिवर्तन
और शिशु जन्म
नाम ना जान सका
किन्तु कर लिया
मधुलिका का चुम्बन
सत्य होता हुआ
वह धुंधला स्वप्न, शांत सागर की एक समय से
स्वयं ही में उफनती उर लहरों का 
पूर्णिमा के चाँद को देखकर
उसको पाने को दौड़ना
प्यासी सीप में
मुक्ता बन्ने वाली बूँद का आना,
अज्ञात बादल से .
अज्ञात उद्गम स्थल से ,
निकली इठलाती मचलती नदी का
सागर में विलीन हो जाना.
एक चित्रकार का 
बन्ने वाले चित्र की
भाव भंगिमा में विचारों में
पूर्ण तल्लीन हो जाना
चौराहे पर खड़े यात्री का
उस राह  को छोड़ कर
जिससे वह आया है
उस राह को खोजना
जिसपर उसे जाना है
और सहयात्री की तलाश
प्रतीक्षा है भावी की.

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0

पी-पी कि ध्वनि

पी-पी की ध्वनि

प्रज्वलित धरती की तपन और सूखे होंठ
शीतल तीव्र पवन
काली घटाएं
वर्षा का सन्देश
दूधिया बादल से
स्वांति की बूँद
मध्य में ही कहीं
अटकी-भटकी
पपीहा की तड़पन
हर बूँद में स्वांति का दर्शन
झूठा प्रतिबिम्ब
सूखे होंठों की प्यास
प्रतिपल स्वांति के आगमन की आस
मौन खंडहरों में
प्रतिध्वनि की आशा से
की गई ध्वनि
ध्वनि के कहीं तक जाने
और लौट कर आने तक की प्रतीक्षा
उस ध्वनि के
अन्तरिक्ष के खोखले तन में
टूटकर बिखर जाने के बाद
मिली निराशा
रात्रि के गहन अन्धकार में
स्वप्न मंदिर में
अचानक
 एकाकीपन का अंत
माथे की बिंदिया
मांग का सिन्दूर
मधुर मिलन
भोर की प्रथम किरण के साथ ही
मंदिर से निकली ध्वनि प्रतिध्वनि
स्वप्न मंदिर की मूर्ति का
टूट कर बिखर जाना
प्राप्त निराशा
लेकिन उस अस्तित्व की संज्ञा के
बोध का प्रश्न चिन्ह
वही पी पी की ध्वनि
और सूखे होंठ.


**********
1

निवेदन

निवेदन

ओ अंतर्वासिनी 
यदि मैं अपनी
ह्रदय वेदना का भार
तुम्हें सौंप दूँ 
तो क्या तुम मेरा सन्देश 
"उस" तक पहुंचा दोगी
मेरी आस्था कि पंखुरियां 
मुरझा कर ना बिखर जाएँ 
इससे पहले
मेरा अश्रु निर्झर
मेरे विश्वासों कि श्रंखला को 
तोड़ कर बह निकले 
इससे पहले
हे अंतर्वसिनी
तुम्हें उस तक पहुंचना होगा 
सुनो! यदि मेरी ह्रदय-वेदना
बहुत भारी है
तो "वह" तुम्हें निकट ही मिल जायेगा 
और तुम्हारा भार स्वयं वहां कर लेगा 
इसके विपरीत यदि वह हलकी है
तो तुम्हें "उसकी" खोज में भटकना पड़ेगा
किन्तु "वह" मिलेगा अवश्य.

*************


0

सूक्ष्म

सूक्ष्म

सूक्ष्म का विस्तार
और सागर में भंवर
अद्रश्य, द्रश्य और अद्रश्य
जीवन के स्वर
बिन्दुओं के अनेकों बिम्ब
प्रतिबिम्ब
पुनः डिम्ब
अवलंबित का आधार
निराधार
निराधार का विस्तार
विश्वाधार
अनंत का शैशव अंत 
अंत कि किलकारी मृत्यु
किलकारी का स्वर
मृत्यु-पर्यंत गर्भायु
और अनंत दर्शन
अनंत का अटूट बंधन
सौंदर्य बोध मधुबन
सूक्ष्म का संकुचन
और अनंत विहार.


***************










a
1

तब अब

तब अब

अभी बैठे थे
सभी रिश्तेदार
मित्रगण
कितने विचित्र थे वे क्षण 
आकाश पर महल बना
सितारों पर
कर रहे थे भ्रमण 
दीर्घायु पाने के लिए 
सबके जाने पर मैं 
अकेला रह गया हूँ
एकांत देख 
विचारों में बह गया हूँ
देख रहा हूँ
एक गहरी  खाई 
जिसकी गहराई में,
मैं बढ़ा जा रहा हूँ
अनंत में विलीन होने के लिए
अपने विचारों के साथ 
उनके पीछे
जो जा चुके हैं
इस अनंत के किसी अंत तक
मुझे बुलाने के लिए.

*************


1

वह

वह

प्रातः 
माँ ,  मैं
मैं क्या?
मैं? मैं
दोपहर,
मैं, मेरा,
तुम, तुम्हारा 
सांझ,
मैं मेरा,
तुम , तुम्हारा,
यह, इसका, 
सब, सबका,
अब शायद, वह
वह उ-स-का 
किन्तु घोर अँधेरा!
फिर कब सवेरा ?
अज्ञात.
प्रातः
माँ .  मैं,  क्या?
"मैं"   "वह"
"वह"
"उसका"
दोपहर
"वह" "उसका"
सांझ
"वह" "उसका"
और, तीव्र प्रकाश
फिर कब अन्धकार?
अज्ञात.

**********

0

बढ़ो हे !

बढ़ो हे !

बढ़ो हे !
मनु-तरु के पुत्र
पृथ्वी के तिमिर गर्भ से निकल
उस अनंत अन्तरिक्ष कि ओर
उन कंटीली झाड़ियों को रौंध कर
जो छेड़ देती हैं
नव प्रस्फुटित कोपलों को
और पकने तक वह छिद्र
कई गुना बड़ा हो जाता है
बनजाता है 
एक खोखला सा निर्बल तरु
और क्षुद्र पवन वेग के माध्यम से
परिचित हो जाता है उससे
अक्षय अनंत मरू
ज्ञात है, संगती का प्रभाव
मात्र उसमें प्राण का आभाव
किन्तु मिटटी देह 
मिटटी में मिली हुई 
जो तपती रहती है
अनंत कल तक मरुस्थल में
सूर्य कि गर्मी से
यह मुक्ति तो नहीं
यह जीवन तो लाखों को मिलता है
और लाखों कि नानति है
कथित गाथा
किन्तु कोई एक ही 
उन कंटीली झाड़ियों को रौंध कर 
उस असीम कि ओर बढ़ता है
किसकी पुष्पांजलि
विश्व बंधु की पूजा की थाली में
सुसज्जित होती है
वह मुक्ति होती है
इसलिए
बढ़ो हे!
मनु-तरु के पुत्र
पृथ्वी के तिमिर गर्भ से निकल
उस अनंत अन्तरिक्ष की ओर. 


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3

परिवर्तन

 परिवर्तन


तुम मेरे द्वार आए, किन्तु,
अकारण ही मैंने,
अपने द्वार बंद कर लिए.
मुझे अपने ही भवन में सताने लगे
अपने ही साए
अपनी ही सांसों से घुटने लगा मेरा दम
प्रातः भी हुई, दोपहर भी  हुई , और हुई शाम भी
किन्तु मेरे लिए था
केवल रात्रि का तम
अन्धकार में भटकते भटकते
अनजाने ही मैंने द्वार खोल दिए
मैं प्रकाश का अभ्यस्त भी ना हो सका
कि तुम मेरे अन्दर आ गए
और मैं बाहर निकल पड़ा
तुम्हें खोजने
अब प्रकाश कि भटकन शुरू हुई
मैं भवन के चरों और खोज रहा था तुम्हें
कि मैंने देखा
मेरे भवन में प्रकाश हो रहा है
कोई दीपक जलाये बैठा है
मैं अन्दर गया और देखा , तुम ही थे
हाँ मैंने तुम्हें पा लिया
और अपने  भवन का द्वार
सबके लिए खोल दिया


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1

आकांक्षा

आकांक्षा
मैं नहीं चाहता जीना
उस पत्थर कि तरह
जो चौराहे पर पड़ा
ठोकरें खाते खाते मिल जाता है रेत में
या जो वेगवान समय के
निर्झर पथ पर पड़ा
घिस जाता है
मेरी चाह है मैं आ सकूँ तुम्हारे काम
इसलिए मुझे छील डालो छेनी लेकर
मैं कुछ नहीं  बोलूँगा
और कुछ नहीं बोलूँगा
जब बन जाऊँगा
मील का वह पत्थर
जो राह दिखा सकेगा
भटके राही को
सदियों तक
या , तुम्हारी आत्मा को
शुद्ध करने वाली
एक मूर्ति
पूजा की.



***********
1

स्वप्न; एक प्रश्न


स्वप्न; एक प्रश्न 


मैं  वर्तमान में मृत
या अजन्मा हूँ
और भविष्य में जी रहा हूँ
और तुम
मेरे लिए तुम्हारा जीवन शाश्वत है
या तो मैं,
अपने शरीर से विलग
भटकती आत्मा हूँ
जिसे तुम
अपनी बांहों में पाने में असमर्थ हो
या, मैं ही तुम्हें अपने स्वप्न से विलग कर
अपने आलिंगन में नहीं भर सकता
सत्य क्या है?
मुझे समय चाहिए
अर्थ समझने के लिए
अपने स्वप्न का.


*********
0

मयूर नाच रहा है


मयूर नाच रहा है 

मयूर नाच रहा है 
"यक्ष" पुकार रहा है
टप टप टप टप बूँदें गिर रही हैं
बादल का सीना भीषण आवाज़ के साथ 
फट गया है
वाह रो रहा है
आसमान मौन है
ओह! सूरज ने भी आँखें मींच ली हैं
मयूर नाच रहा है..................

पवन शोक विव्हल 
वियोग रागिनी गा रहा है
घटाओं ने मातमी चादर ओढ़ ली है
पपीहा पी पी पुकार रहा है 
मयूर अब भी नाच रहा है...............


***********
8

ह्रदय के भेद

ह्रदय के भेद


मैं  ह्रदय के भेद सारे खोल देना चाहता था
एकला था मैं तुम्हें भी साथ लेना चाहता था
तुम ना समझे मेरी भाषा
मेरे ह्रदय कि भावना को
तुम ना समझे
कुछ तो हैं मेरी विवशताएँ
हैं सीमायें मेरी कुछ
कैसे समझाउं
तुम्हें वह सब 
जग कि भाषा में
गर समझना चाहते हो तो,
ह्रदय कि मूक भाषा से समझ लो 
रौशनी के झुण्ड से,
छिटकी किरण से
पा सको तो मार्ग पा लो
फूल हो तुम ,
मुझको बस कांटा समझ 
अपना बना लो
मैं तुम्हारा हूँ
मगर, तुमने मुझे अपना न माना
मेरी बातों पर किये शक 
सिर्फ मुझको गैर जाना
मूल्य है जिसका नहीं कोई, 
तुम्हें मैं, दोस्त ऐसा प्यार देना चाहता था
मैं ह्रदय के भेद सारे खोल देना चाहता था.



*************
1

कल और आज


कल और आज


कल(आने वाला) का आज से क्या सम्बन्ध?
कल (आने वाला) कौन है ?
वह भी नहीं जानता,
वह मौन है
और कल(बीता हुआ)
एक पूर्ण ऐतिहासिक निबंध
"आज" बोल रहा है
कलियुग और सतयुग को
काल कि तराजू पर तोल रहा है
कलयुग ही श्रेष्ठ है
उसमें :आज "है
उसमें कल कि अनुभूति
और मौन कल(आने वाले) कि स्वरहीन 
किन्तु सांकेतिक आवाज़ है
कल एक स्वप्न था
जो टूट गया
किन्तु उसका चित्र
स्मृति पटल पर छूट गया
और कल एक "स्वप्न" है
जो प्रतिपल है.



********
3

जान ही जाओगे

जान ही जाओगे हमको एक दिन
मान ही जाओगे हमको एक दिन
क्यूँ ख्यालों में जिया करते हैं हम
क्यूँ सवालों में जिया करते हैं हम
बांटते हैं क्यूँ ख़ुशी सबके लिए
आप प्यालों में पिया करते हैं गम

दे रखा है हमको ईश्वर ने बहुत
कोई ख्वाहिश और अब बाकी नहीं
प्यास पूरी कर सके जो प्यार कि
दुनिया में ऐसा कोई साकी नहीं
प्यार ही है अब हमारी जिंदगी
प्यार ही है अब हमारा एक धरम

राज़ कि है बात एक हमसे सुनो
मत जियो तुम सिर्फ अपने वास्ते
गैर भी भटका हुआ है गर कहीं
बढ़के उसको भी दिखाओ रास्ते
जीत लो नफरत को उसकी प्यार से
जो जायेगा तुम पर भी अल्लाह का करम

जो मिला है उतने में ही सब्र कर
भूल जा जो खो गया उस प्यार को
चल रहा जो साथ उसके साथ चल
छोड़ कर दुनिया को इस संसार को
मुस्कुरा के काट दे ये जिंदगी
अब ना देखूं मैं तेरी ये आँख नम

वासना को साधना में बदल कर
साधिका तू ध्यानकर नन्दलाल का
राख का है ढेर ये माती कि काया
तोड़ दे अब मोह तू इस खाल का
कृष्ण कि वंशी तुझे देती सदा
आ भी जा अब तोड़ कर सारा भरम

****************

तू और मैं


तू नश्वर है
मैं अमर हूँ
तू पृथ्वी है
मैं दिनकर हूँ
तू पक्षी है
मैं तरुवर हूँ
तू बदल है
मैं अम्बर हूँ
तू पतझड़ है
मैं सदाबहार हूँ
तू देह है
मैं आत्मा कि पुकार हूँ.


*********
3

अपना घर

अपना घर क्यूँ भूला अपने घर चल रे
छोड़ ये चौका चूल्हा अपने घर चल रे

देश छोड़ परदेस में आया
तूने अपना आप भुलाया
समझ रहा क्यूँ इसको अपना,
छोड़ येरेन बसेरा , अपने घर चल रे  .अपना घर...............

क्या लाया क्या ले जाएगा
सोच  रहा क्यूँ पछतायेगा
छोड़ दे सब सामान यहाँ का
ताज दे सभी बखेड़ा, अपने घर चल रे. अपना घर...............


तेरा अपना तुझे पुकारे
खड़ा हुआ ले प्रेम सुधा रे
अन्धकार सब दूर हो गया
आया नया सवेरा, अपने घर चल रे.अपना घर....................


वहीँ चैन आराम मिलेगा
माया से विश्राम मिलेगा
क्यूँ उससे रूठा है जोगी
उससे मुंह क्यूँ फेरा, अपने घर चल रे. अपना घर..........................


***********


कहाँ परदेस में आकर मैं अपने देश को भूला
विदेशी वेश पहना और अपने वेश को भूला
यहाँ आया था मैं किस काम से भेजा था किसने क्यूँ
विदेशी जाल में ऐसा फंसा , सन्देश को भूला.
1

वही खुदा

सबके नसीब का देगा वही खुदा
दाना गरीब का देगा वही खुदा
तू ऐतबार रख उसके जमाल पर
सबकी बलाएँ  खुद लेगा वही खुदा

माना की वक़्त है गर्दिश में अब तेरा
लेकिन क्या रात का होगा ना सवेरा
ज़ुल्मों को सहन कर तू रब के नाम पर
ज़ालिम को खुद सजा देगा वही खुदा

एक तू ही तो नहीं दुनिया में बदनसीब
लाखों हैं और भी तेरे से भी गरीब
उसके करीब जा दामन पसार कर
दाता है सबका वो देगा वही खुदा

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मेरा जीवन मौत की किश्तें चुकाए जा रहा है
एक ख़ुशी के वास्ते सौ गम उठाये जा रहा है
जानता हूँ टूट कर टुकड़े हुए रिश्ते सभी
फिर भी न जाने क्यूँ उन्हें कैसे निभाये जा रहा है
0

निर्लिप्त

मौत से लगता नहीं अब दर मुझे
जिंदगी से प्यार भी मुझको नहीं
दोस्तों से है नहीं वफ़ा की उम्मीद
दुश्मनों से दुश्मनी करता नहीं

अब ना कोई आज मेरे पास है
दूर भी मुझसे नहीं कोई कहीं
अब कभी मुझको हंसी आती नहीं
एक समय से आँख भी रोई नहीं

जागता हूँ होश में या सो गया
बेहोश हूँ या स्वप्न में खोया कहीं
जी रहा हूँ मैं या शव बन कर पड़ा
गा रहा हूँ गीत रूह बनकर कहीं

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आसमान चलता हुआ आया कहाँ से
बाजुओं में आ मेरे गुम हो गया
खोजने जब लग पड़ा मैं आसमान को
देखा मैं ही आसमान खुद हो गया
2

काश

काश अगर तुम साथ हमारे होते
जीवन का सफ़र कुछ और हसीं हो जाता
ना सावन में हम आहें भरते होते
ना रह रह कर दिल हाथ से निकला जाता

ना नज़र हमारी तुम्हें खोजती फिरती
ना दीवाना दिल हमें कहीं भटकाता
ना दर्द भरा कोई गीत फूटता दिल से
ना गीत मेरा कोई गाकर मुझे रुलाता

ना रातों में यूँ नींद हमारी उडती
ना जाम पिला कर हमको कोई सुलाता
ना सपनों में यूँ बार बार तुम आते
ना स्वप्न टूट जाने पर मैं पछताता

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क्षण दो क्षण भर साथ निभाकर कहाँ खो गए ओ सहगामी
क्षण दो क्षण भर प्रीत निभा कर कहाँ खो गए ओ सहगामी
4

स्वप्न हूँ मैं

स्वप्न हूँ मैं आँखों में तेरी
नींद नहीं आने दूंगा
बहुत दिनों के बाद मिले तुम
तुम्हें ना अब जाने दूंगा

खो जाऊँगा तुमको लेकर मैं
एक अजाने स्वप्नलोक में,
जिस दिशा से तुम आये हो अब,
उस और नहीं जाने दूंगा
स्वप्न हूँ मैं.............

इन्द्रधनुषी रंगों से रंग दूंगा
तेरा संसार सलोना
तोड़ के सब बंधन संग मेरे
आओ तारों के पार चलो ना
ले जाऊँगा उस पार तुम्हें
इस पार नहीं आने दूंगा.
स्वप्न हूँ मैं.............
*****************

ये संसार स्वप्नमय सारा ,
इस दुनिया में कौन हमारा
माया के ये बंधन सारे
कौन किसी के साथ चला रे
किसने किसको यहाँ पुकारा
1

या

यह मधुकर कि गूँज है
या, आह कोई भरता है
यह विधि प्रदत्त उपहार है
या, बेमौत कोई मरता है

यह शिशिर ऋतू का समय है
या सूख गई है डाली
शशि को मेघों ने ढांप लिया
या रजनी मावस की काली

यह बिजली की है चमक दमक
या शोले जलते हैं
यह सावन की बौछार है
या अश्रु झरते हैं

यह पायल की झंकार है
या कंगन फूट रहे हैं
यह क्षणिक विदाई का पल है
या रिश्ते टूट रहे हैं

************

विश्वास नहीं होता मुझको मैं जिंदा हूँ
अहसास मुझे कर लेने दो मैं जिंदा हूँ
6

काफिला घटता गया ज्यों ज्यों सफ़र लम्बा हुआ

काफिला घटता गया
ज्यों ज्यों सफ़र लम्बा हुआ
हम अकेले रह गए
मंजिल पर पहुँच जाने के बाद

एक राही हमसफ़र बन
साथ भी कुछ पल चला
चलते चलते खो गया वाह
राह दिखलाने के बाद

होश खो बैठे थे हम
होश मैं रहते हुए
आज हम हैं होश में
बेहोश हो जाने के बाद

हम तरसते रह गए थे
जिंदगी को जिंदगी में
जिंदगी हमको मिली है
आज मर जाने के बाद

तोड़ दी थीं हमने लड़ियाँ
मोतियों की जोश में
आज मोती खोजते हैं
हम बिखर जाने के बाद

*************

काल पुष्प मत मिलो धूल में
पवन सुगन्धित बहने दो
आये नहीं अभी शिशिर के क्षण
बसंत ही रहने दो

5

गीत अचानक बन जाता है

गीत अचानक बन जाता है



गीत अचानक बन जाता है
जब मैं बेसुध हो जाता हूँ
तुम छा जाती हो नयनों में
मैं दुनिया से खो जाता हूँ, गीत अचानक बन जाता है............

लय खुद ही बनती जाती है
जब मैं उसे गाने लगता हूँ
शब्दों के रथ पर चढ़ कर जब
जा पास तेरे आने लगता हूँ,गीत अचानक बन जाता है..........

मन वीणा का स्वर भी आकर
उसमें शामिल हो जाता है,
स्मरण मात्र ही सावन का फिर
भावों को आ धो जाता है ,गीत अचानक बन जाता है..........

टूट गया है स्वप्न मेरा जब ,
होता है आभास मुझे फिर,
कागज़ के पन्नों पर आकर,
याद को पंख लगा जाता है ,गीत अचानक बन जाता है...........


**************
तेरी आँखों में छिपी तस्वीर हूँ
तेरे हाथों पर लिखी तकदीर हूँ
तेरे सपनों की परी हूँ मान ले
अब तक ना  पहचाना , मगर अब जान ले
तेरे हाथों से बंधी ज़ंजीर हूँ.