1

तब अब

तब अब

अभी बैठे थे
सभी रिश्तेदार
मित्रगण
कितने विचित्र थे वे क्षण 
आकाश पर महल बना
सितारों पर
कर रहे थे भ्रमण 
दीर्घायु पाने के लिए 
सबके जाने पर मैं 
अकेला रह गया हूँ
एकांत देख 
विचारों में बह गया हूँ
देख रहा हूँ
एक गहरी  खाई 
जिसकी गहराई में,
मैं बढ़ा जा रहा हूँ
अनंत में विलीन होने के लिए
अपने विचारों के साथ 
उनके पीछे
जो जा चुके हैं
इस अनंत के किसी अंत तक
मुझे बुलाने के लिए.

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1

वह

वह

प्रातः 
माँ ,  मैं
मैं क्या?
मैं? मैं
दोपहर,
मैं, मेरा,
तुम, तुम्हारा 
सांझ,
मैं मेरा,
तुम , तुम्हारा,
यह, इसका, 
सब, सबका,
अब शायद, वह
वह उ-स-का 
किन्तु घोर अँधेरा!
फिर कब सवेरा ?
अज्ञात.
प्रातः
माँ .  मैं,  क्या?
"मैं"   "वह"
"वह"
"उसका"
दोपहर
"वह" "उसका"
सांझ
"वह" "उसका"
और, तीव्र प्रकाश
फिर कब अन्धकार?
अज्ञात.

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0

बढ़ो हे !

बढ़ो हे !

बढ़ो हे !
मनु-तरु के पुत्र
पृथ्वी के तिमिर गर्भ से निकल
उस अनंत अन्तरिक्ष कि ओर
उन कंटीली झाड़ियों को रौंध कर
जो छेड़ देती हैं
नव प्रस्फुटित कोपलों को
और पकने तक वह छिद्र
कई गुना बड़ा हो जाता है
बनजाता है 
एक खोखला सा निर्बल तरु
और क्षुद्र पवन वेग के माध्यम से
परिचित हो जाता है उससे
अक्षय अनंत मरू
ज्ञात है, संगती का प्रभाव
मात्र उसमें प्राण का आभाव
किन्तु मिटटी देह 
मिटटी में मिली हुई 
जो तपती रहती है
अनंत कल तक मरुस्थल में
सूर्य कि गर्मी से
यह मुक्ति तो नहीं
यह जीवन तो लाखों को मिलता है
और लाखों कि नानति है
कथित गाथा
किन्तु कोई एक ही 
उन कंटीली झाड़ियों को रौंध कर 
उस असीम कि ओर बढ़ता है
किसकी पुष्पांजलि
विश्व बंधु की पूजा की थाली में
सुसज्जित होती है
वह मुक्ति होती है
इसलिए
बढ़ो हे!
मनु-तरु के पुत्र
पृथ्वी के तिमिर गर्भ से निकल
उस अनंत अन्तरिक्ष की ओर. 


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3

परिवर्तन

 परिवर्तन


तुम मेरे द्वार आए, किन्तु,
अकारण ही मैंने,
अपने द्वार बंद कर लिए.
मुझे अपने ही भवन में सताने लगे
अपने ही साए
अपनी ही सांसों से घुटने लगा मेरा दम
प्रातः भी हुई, दोपहर भी  हुई , और हुई शाम भी
किन्तु मेरे लिए था
केवल रात्रि का तम
अन्धकार में भटकते भटकते
अनजाने ही मैंने द्वार खोल दिए
मैं प्रकाश का अभ्यस्त भी ना हो सका
कि तुम मेरे अन्दर आ गए
और मैं बाहर निकल पड़ा
तुम्हें खोजने
अब प्रकाश कि भटकन शुरू हुई
मैं भवन के चरों और खोज रहा था तुम्हें
कि मैंने देखा
मेरे भवन में प्रकाश हो रहा है
कोई दीपक जलाये बैठा है
मैं अन्दर गया और देखा , तुम ही थे
हाँ मैंने तुम्हें पा लिया
और अपने  भवन का द्वार
सबके लिए खोल दिया


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1

आकांक्षा

आकांक्षा
मैं नहीं चाहता जीना
उस पत्थर कि तरह
जो चौराहे पर पड़ा
ठोकरें खाते खाते मिल जाता है रेत में
या जो वेगवान समय के
निर्झर पथ पर पड़ा
घिस जाता है
मेरी चाह है मैं आ सकूँ तुम्हारे काम
इसलिए मुझे छील डालो छेनी लेकर
मैं कुछ नहीं  बोलूँगा
और कुछ नहीं बोलूँगा
जब बन जाऊँगा
मील का वह पत्थर
जो राह दिखा सकेगा
भटके राही को
सदियों तक
या , तुम्हारी आत्मा को
शुद्ध करने वाली
एक मूर्ति
पूजा की.



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1

स्वप्न; एक प्रश्न


स्वप्न; एक प्रश्न 


मैं  वर्तमान में मृत
या अजन्मा हूँ
और भविष्य में जी रहा हूँ
और तुम
मेरे लिए तुम्हारा जीवन शाश्वत है
या तो मैं,
अपने शरीर से विलग
भटकती आत्मा हूँ
जिसे तुम
अपनी बांहों में पाने में असमर्थ हो
या, मैं ही तुम्हें अपने स्वप्न से विलग कर
अपने आलिंगन में नहीं भर सकता
सत्य क्या है?
मुझे समय चाहिए
अर्थ समझने के लिए
अपने स्वप्न का.


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0

मयूर नाच रहा है


मयूर नाच रहा है 

मयूर नाच रहा है 
"यक्ष" पुकार रहा है
टप टप टप टप बूँदें गिर रही हैं
बादल का सीना भीषण आवाज़ के साथ 
फट गया है
वाह रो रहा है
आसमान मौन है
ओह! सूरज ने भी आँखें मींच ली हैं
मयूर नाच रहा है..................

पवन शोक विव्हल 
वियोग रागिनी गा रहा है
घटाओं ने मातमी चादर ओढ़ ली है
पपीहा पी पी पुकार रहा है 
मयूर अब भी नाच रहा है...............


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7

ह्रदय के भेद

ह्रदय के भेद


मैं  ह्रदय के भेद सारे खोल देना चाहता था
एकला था मैं तुम्हें भी साथ लेना चाहता था
तुम ना समझे मेरी भाषा
मेरे ह्रदय कि भावना को
तुम ना समझे
कुछ तो हैं मेरी विवशताएँ
हैं सीमायें मेरी कुछ
कैसे समझाउं
तुम्हें वह सब 
जग कि भाषा में
गर समझना चाहते हो तो,
ह्रदय कि मूक भाषा से समझ लो 
रौशनी के झुण्ड से,
छिटकी किरण से
पा सको तो मार्ग पा लो
फूल हो तुम ,
मुझको बस कांटा समझ 
अपना बना लो
मैं तुम्हारा हूँ
मगर, तुमने मुझे अपना न माना
मेरी बातों पर किये शक 
सिर्फ मुझको गैर जाना
मूल्य है जिसका नहीं कोई, 
तुम्हें मैं, दोस्त ऐसा प्यार देना चाहता था
मैं ह्रदय के भेद सारे खोल देना चाहता था.



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1

कल और आज


कल और आज


कल(आने वाला) का आज से क्या सम्बन्ध?
कल (आने वाला) कौन है ?
वह भी नहीं जानता,
वह मौन है
और कल(बीता हुआ)
एक पूर्ण ऐतिहासिक निबंध
"आज" बोल रहा है
कलियुग और सतयुग को
काल कि तराजू पर तोल रहा है
कलयुग ही श्रेष्ठ है
उसमें :आज "है
उसमें कल कि अनुभूति
और मौन कल(आने वाले) कि स्वरहीन 
किन्तु सांकेतिक आवाज़ है
कल एक स्वप्न था
जो टूट गया
किन्तु उसका चित्र
स्मृति पटल पर छूट गया
और कल एक "स्वप्न" है
जो प्रतिपल है.



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2

जान ही जाओगे

जान ही जाओगे हमको एक दिन
मान ही जाओगे हमको एक दिन
क्यूँ ख्यालों में जिया करते हैं हम
क्यूँ सवालों में जिया करते हैं हम
बांटते हैं क्यूँ ख़ुशी सबके लिए
आप प्यालों में पिया करते हैं गम

दे रखा है हमको ईश्वर ने बहुत
कोई ख्वाहिश और अब बाकी नहीं
प्यास पूरी कर सके जो प्यार कि
दुनिया में ऐसा कोई साकी नहीं
प्यार ही है अब हमारी जिंदगी
प्यार ही है अब हमारा एक धरम

राज़ कि है बात एक हमसे सुनो
मत जियो तुम सिर्फ अपने वास्ते
गैर भी भटका हुआ है गर कहीं
बढ़के उसको भी दिखाओ रास्ते
जीत लो नफरत को उसकी प्यार से
जो जायेगा तुम पर भी अल्लाह का करम

जो मिला है उतने में ही सब्र कर
भूल जा जो खो गया उस प्यार को
चल रहा जो साथ उसके साथ चल
छोड़ कर दुनिया को इस संसार को
मुस्कुरा के काट दे ये जिंदगी
अब ना देखूं मैं तेरी ये आँख नम

वासना को साधना में बदल कर
साधिका तू ध्यानकर नन्दलाल का
राख का है ढेर ये माती कि काया
तोड़ दे अब मोह तू इस खाल का
कृष्ण कि वंशी तुझे देती सदा
आ भी जा अब तोड़ कर सारा भरम

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तू और मैं


तू नश्वर है
मैं अमर हूँ
तू पृथ्वी है
मैं दिनकर हूँ
तू पक्षी है
मैं तरुवर हूँ
तू बदल है
मैं अम्बर हूँ
तू पतझड़ है
मैं सदाबहार हूँ
तू देह है
मैं आत्मा कि पुकार हूँ.


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