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अपना घर

अपना घर क्यूँ भूला अपने घर चल रे
छोड़ ये चौका चूल्हा अपने घर चल रे

देश छोड़ परदेस में आया
तूने अपना आप भुलाया
समझ रहा क्यूँ इसको अपना,
छोड़ येरेन बसेरा , अपने घर चल रे  .अपना घर...............

क्या लाया क्या ले जाएगा
सोच  रहा क्यूँ पछतायेगा
छोड़ दे सब सामान यहाँ का
ताज दे सभी बखेड़ा, अपने घर चल रे. अपना घर...............


तेरा अपना तुझे पुकारे
खड़ा हुआ ले प्रेम सुधा रे
अन्धकार सब दूर हो गया
आया नया सवेरा, अपने घर चल रे.अपना घर....................


वहीँ चैन आराम मिलेगा
माया से विश्राम मिलेगा
क्यूँ उससे रूठा है जोगी
उससे मुंह क्यूँ फेरा, अपने घर चल रे. अपना घर..........................


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कहाँ परदेस में आकर मैं अपने देश को भूला
विदेशी वेश पहना और अपने वेश को भूला
यहाँ आया था मैं किस काम से भेजा था किसने क्यूँ
विदेशी जाल में ऐसा फंसा , सन्देश को भूला.

3 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर ने कहा…

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

निर्मला कपिला ने कहा…

सुन्दर सन्देश देती रचना महाशिवरात्री की शुभकामनायें

अजय कुमार ने कहा…

फिल्म ’नाम ’ का गाना ’चिट्ठी आई है ’ की याद आ गई

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